Sunday, 20 November 2011

A piece of my HE(ART) ..

Here's a small but heart touching poetry I wrote few months back.


क्या वो दिन थे..

क्या वो दिन थे..
माँ की गोद और पापा के कंधे |
आज याद आ रहा है सब मुझे ||

रोते हुए वो सो जाना
खुद से बात करते हुए खो जाना
वो माँ का आवाज़ लगाना
खाना अपने हाथोँ से खिलाना
वो पापा का डांट लगाना
ज़िद पूरी होने का इंतज़ार करना
क्या वो दिन थे बचपन के सुहाने


माँ की गोद और पापा के कंधे |
आज याद आ रहा है सब मुझे ||


क्या वो दिन थे जब होती थी न पढ़ाई
न थी कोई परेशानी न ही कोई लड़ाई
प्यार ही प्यार था हर तरफ
नही थी नफरत की रेखा
परिवार होता था पूरा
माँ बाप संग बहन भाई


क्यूँ इतनी दूर सब कुछ हो गया ?
अब ज़िद भी अपनी
सपने भी अपने
किस से कहूँ क्या चाहिए मुझे
मंज़िलों को ढूँडते कहाँ खो गए
क्यूँ हम इतने बड़े हो गए....

3 comments:

  1. hmm kyu hum itne bade ho gaye... we realise dat childhood was a celebration only when v reach adulthood :)

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  2. Kya baat hai bhaijaan.. maan gaye :-)

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